सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन पाए
Aryan
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सब जानते हैं कि आजादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री बनें। लेकिन कई लोग आज भी इस बात का दावा करते हैं कि सरदार वल्लभ भाई पटेल देश के प्रधानमंत्री पद के लिए ज्यादा बेहतर उम्मीदवार थे। वहीं कुछ लोग उनके प्रधानमंत्री नहीं बन पाने के पीछे महात्मा गांधी को जिम्मेदार मानते हैं। ऐसे कई सवाल हैं जो लोगों के मन में हैं। आइए जानते हैं आखिर क्या कारण था कि सरदार पटेल की जगह पंडित नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में चुने गए।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार को ये समझ आ गया था कि भारत को अधिक समय तक गुलाम रख पाना संभव नहीं है। ऐसे में ब्रिटेन की तत्कालीन सरकार ने भारत की आजादी और उसके बाद देश के शासन की रूपरेखा तैयार करने के बारे में सोचना शुरू किया। ब्रिटिश सरकार ने इसके लिए अंग्रेज अधिकारियों की एक समिति का निर्माण किया, जिसे कैबिनेट मिशन कहा जाता है।कैबिनेट मिशन को जिम्मेदारी दी गई कि वह भारतीय राजनेताओं से बात करे और आजादी के बाद भारत में शासन व्यवस्था कैसी होगी, इसकी रूपरेखा तैयार करे। 1946 में कैबिनेट मिशन भारत आया और आजादी व भारत के प्रशासन के संदर्भ में भारतीय राजनेताओं से बातचीत करनी शुरू की।
कैबिनेट मिशन की योजना के अनुसार काँग्रेस का अध्यक्ष प्रधानमंत्री बनता
कैबिनेट मिशन की योजना के तहत कांग्रेस का अध्यक्ष ही आगे चलकर भारत का पहला प्रधानमंत्री बनने वाला था। दरअसल भारत की आजादी और शासन संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए वायसरॉय की अध्यक्षता में एक एग्जिक्यूटिव काउंसिल बनाई जानी थी। इस एग्जिक्यूटिव काउंसिल का उपाध्यक्ष कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को बनना था। उस समय यह लगभग तय था कि इस काउंसिल का उपाध्यक्ष ही आजादी के बाद भारत का पहला प्रधानमंत्री बनेगा।जिस समय यह चर्चा चल रही थी, मौलाना अबुल कलाम आजाद काँग्रेस के अध्यक्ष थे। लेकिन उन्हे महात्मा गांधी के दबाव में इस पद से इस्तीफा देना पड़ा और मौलाना आजाद एक तरह से भारत के पहले प्रधानमंत्री बनते बनते रह गए।
मौलाना आजाद के इस्तीफे के बाद काँग्रेस के नए अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई
मौलाना अबुल कलाम आजाद के इस्तीफे के बाद कांग्रेस में नया अध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके लिए अप्रैल 1946 में कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई। इस बैठक में काँग्रेस के सभी बड़े नेता यथा जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, महात्मा गांधी, जे बी कृपलानी, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, खान अब्दुल गफ्फार खान आदि शरीक हुए।यह भी पढ़ें: एक पाकिस्तानी सैनिक को क्यों मिला पद्मश्री सम्मान?
कांग्रेस का नया चुना जाने वाला अध्यक्ष बाद में वायसरॉय की एग्जिक्यूटिव काउंसिल का उपाध्यक्ष बनने वाला था, जो आगे चलकर आजादी के बाद देश का पहला प्रधानमंत्री बनने वाला था। तो कुल मिलकर यह कहा जा सकता है कि ये बैठक दरअसल देश के पहले प्रधानमंत्री को चुनने के लिए की जा रही थी।
उस समय कांग्रेस में कुल 15 प्रांतीय कमेटियाँ थी, जिनमें से 12 कमेटियों ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम का प्रस्ताव दिया। जबकि 3 अन्य कमेटियों ने जे बी कृपलानी और पट्टाभि सीतारमैया के नाम का प्रस्ताव दिया। इससे ये बात तो साफ है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू अध्यक्ष पद और बाद में प्रधानमंत्री के पद के लिए प्रस्तावित ही नहीं किये गए थे। वहीं सरदार वल्लभ भाई पटेल की संगठन पर पूरी पकड़ थी और बहुमत उनके पक्ष में था।
बताया जाता है कि महात्मा गांधी ने मौलाना आजाद को एक पत्र लिखकर भी इस बात का जिक्र किया था कि वह कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में पंडित जवाहर लाल नेहरू को ही प्राथमिकता देंगे।
हालांकि महात्मा गांधी के इस रुख के बाद भी पंडित नेहरू के नाम पर सहमति बनती दिखाई नहीं दे रही थी। लेकिन गांधी अपनी बात पर अड़े हुए थे। अंत में महात्मा गांधी के दबाव में आचार्य जे बी कृपलानी झुके और उन्होंने कहा कि मैं बापू की भावनाओं का सम्मान करते हुए जवाहर लाल नेहरू के नाम का प्रस्ताव रखता हूँ। उन्होंने एक कागज पर पंडित नेहरू का नाम लिख कर आगे बढ़ा दिया। बाद में कार्यसमिति के कई अन्य सदस्यों ने भी उस कागज पर अपने हस्ताक्षर कर दिए और नेहरू को अपना समर्थन दे दिया। इस कागज पर सरदार पटेल ने भी अपने हस्ताक्षर किये थे।
इस बैठक ने जे बी कृपलानी ने सरदार पटेल से निवेदन किया कि वह अपनी उम्मीदवारी वापस ले लें और महात्मा गांधी की भावनाओं का सम्मान करें। सरदार पटेल ने भी बापू का सम्मान करते हुए अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। अध्यक्ष पद के लिए अंतिम फैसला महात्मा गांधी पर छोड़ दिया गया।
इस घटनाक्रम से ये साफ है कि सरदार पटेल के प्रधानमंत्री नहीं बनने के पीछे महात्मा गांधी का सीधा योगदान था, तो नेहरू के प्रधानमंत्री बनने रास्ते भी बापू के कारण ही खुले थे। इस तरह आजादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने। वहीं सरदार पटेल ने उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ साथ सूचना व प्रसारण मंत्री का भी पद संभाला।
कांग्रेस का नया चुना जाने वाला अध्यक्ष बाद में वायसरॉय की एग्जिक्यूटिव काउंसिल का उपाध्यक्ष बनने वाला था, जो आगे चलकर आजादी के बाद देश का पहला प्रधानमंत्री बनने वाला था। तो कुल मिलकर यह कहा जा सकता है कि ये बैठक दरअसल देश के पहले प्रधानमंत्री को चुनने के लिए की जा रही थी।
सरदार पटेल को था सबसे ज्यादा समर्थन, नेहरू को किसी ने नहीं दिया था वोट
यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि उस समय देश में कांग्रेस के अध्यक्ष का चुनाव प्रांतीय कांग्रेस कमेटियाँ करती थी। इसके लिए हर प्रांत की कांग्रेस कमेटी अपने उम्मीदवार के रूप में एक व्यक्ति का नाम प्रस्तावित करती थी और जिसका नाम सबसे ज्यादा प्रस्तावित किया जाता था, वह कांग्रेस का अध्यक्ष बनता।उस समय कांग्रेस में कुल 15 प्रांतीय कमेटियाँ थी, जिनमें से 12 कमेटियों ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम का प्रस्ताव दिया। जबकि 3 अन्य कमेटियों ने जे बी कृपलानी और पट्टाभि सीतारमैया के नाम का प्रस्ताव दिया। इससे ये बात तो साफ है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू अध्यक्ष पद और बाद में प्रधानमंत्री के पद के लिए प्रस्तावित ही नहीं किये गए थे। वहीं सरदार वल्लभ भाई पटेल की संगठन पर पूरी पकड़ थी और बहुमत उनके पक्ष में था।
महात्मा गांधी का हस्तक्षेप और पंडित नेहरू का कांग्रेस का अध्यक्ष बनना
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में ये साफ हो चुका था कि सरदार वल्लभ भाई पटेल के पास कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए बहुमत है। लेकिन दूसरी ओर कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ और सम्मानित नेता महात्मा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष के लिए जवाहर लाल नेहरू को पसंद करते थे। महात्मा गांधी ने मौलाना आजाद को पद छोड़ने के लिए कहा उस समय भी पंडित नेहरू को अध्यक्ष बनाने की बात कही थी।बताया जाता है कि महात्मा गांधी ने मौलाना आजाद को एक पत्र लिखकर भी इस बात का जिक्र किया था कि वह कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में पंडित जवाहर लाल नेहरू को ही प्राथमिकता देंगे।
हालांकि महात्मा गांधी के इस रुख के बाद भी पंडित नेहरू के नाम पर सहमति बनती दिखाई नहीं दे रही थी। लेकिन गांधी अपनी बात पर अड़े हुए थे। अंत में महात्मा गांधी के दबाव में आचार्य जे बी कृपलानी झुके और उन्होंने कहा कि मैं बापू की भावनाओं का सम्मान करते हुए जवाहर लाल नेहरू के नाम का प्रस्ताव रखता हूँ। उन्होंने एक कागज पर पंडित नेहरू का नाम लिख कर आगे बढ़ा दिया। बाद में कार्यसमिति के कई अन्य सदस्यों ने भी उस कागज पर अपने हस्ताक्षर कर दिए और नेहरू को अपना समर्थन दे दिया। इस कागज पर सरदार पटेल ने भी अपने हस्ताक्षर किये थे।
इस बैठक ने जे बी कृपलानी ने सरदार पटेल से निवेदन किया कि वह अपनी उम्मीदवारी वापस ले लें और महात्मा गांधी की भावनाओं का सम्मान करें। सरदार पटेल ने भी बापू का सम्मान करते हुए अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। अध्यक्ष पद के लिए अंतिम फैसला महात्मा गांधी पर छोड़ दिया गया।
बापू को लगता था नेहरू भारत का प्रतिनिधित्व बेहतर तरीके से कर पाएंगे
महात्मा गांधी ने उस समय के एक पत्रकार दुर्गादास को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि पंडित जवाहर लाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अंग्रेजों से ज्यादा बेहतर तरीके से बातचीत कर पाएंगे। इसके अलावा उनका मानना ये भी था कि अंतरराष्ट्रीय मामलों मे पंडित नेहरू देश का प्रतिनिधित्व सरदार पटेल से बेहतर तरीके से कर पाएंगे।इस घटनाक्रम से ये साफ है कि सरदार पटेल के प्रधानमंत्री नहीं बनने के पीछे महात्मा गांधी का सीधा योगदान था, तो नेहरू के प्रधानमंत्री बनने रास्ते भी बापू के कारण ही खुले थे। इस तरह आजादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने। वहीं सरदार पटेल ने उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ साथ सूचना व प्रसारण मंत्री का भी पद संभाला।
