FAQ – नोएडा ट्विन टॉवर्स डेमोलिशन (Noida Twin Towers Demolition)

नोएडा के बहुचर्चित ट्विन टॉवर्स को 28 अगस्त को ढहा दिया गया। 32 मंजिल ट्विन टॉवर्स को ढहाने के लिए इम्प्लोशन तकनीक का सहारा लिया गया जिससे आसपास मौजूद किसी भी दूसरी बिल्डिंग को नुकसान नहीं पहुंचा।

आइए जानते हैं इस मामले से जुड़े हुए सामान्यतः पूछे जाने वाले प्रश्नों (FAQs) के उत्तर –
 
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क्या थे ट्विन टॉवर्स?

नोएडा के सेक्टर 93ए में स्थित ट्विन टॉवर्स को सुपरटेक बिल्डर्स ने बनाया था। इनमें 32 मंजिला इमारत ऐपेक्स टावर तो 29 मंजिल इमारत को सियान टावर नाम दिया गया था। बाद में पाया गया कि इन इमारतों को बनाने में नियमों का उल्लंघन किया गया था।

इसके निर्माण के खिलाफ निकटवर्ती एमराल्ड कोर्ट कालोनी के बायर्स ने अपने खर्चे पर एक लंबी लड़ाई लड़ी थी और इसके लिए वे इलाहाबाद हाईकोर्ट तक गए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2014 में इन दोनों टॉवर्स को गिराने का आदेश दे दिया। बाद में सुपरटेक बिल्डर्स इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची, लेकिन उसे वहाँ भी कोई राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और दोनों टॉवर्स को गिराने का आदेश दिया।

ट्विन टॉवर्स के पीछे क्या विवाद था?

23 नवंबर 2004 को नोएडा अथॉरिटी ने सुपरटेक बिल्डर्स को एमराल्ड कोर्ट के निर्माण के लिए जमीन का आवंटन किया था। इसमें सुपरटेक को कुल 84,273 वर्गमीटर जमीन आवंटित की गई थी। 16 मार्च 2005 को इस जमीन की लीज डीड हुई। इस दौरान जमीन की पैमाइश में हुई लापरवाही के कारण आवंटित जमीन के पास ही 6556 वर्ग मीटर का एक और जमीन का टुकड़ा निकल आया। इसे सुपरटेक ने बाद में अपने नाम से ही आवंटित करवा लिया। इसके लिए 21 जून 2006 को लीज डीड की गई।

सुपरटेक ने इन दो प्लॉटस को एक प्लॉट बना दिया और इस पर एमराल्ड कोर्ट प्रोजेक्ट लॉन्च कर दिया। इस प्रोजेक्ट में बिल्डर को 11 मंजिल के 16 टॉवर्स बनाने थे। वहीं नक्शे के अनुसार जिस जमीन पर ट्विन टॉवर्स खड़े थे वहाँ ग्रीन पार्क दिखाया गया था।

2008-9 में इस प्रोजेक्ट को नोएडा अथॉरिटी की तरफ से कम्प्लीशन सर्टिफिकेट भी मिल गया। लेकिन 2009 में उत्तर प्रदेश प्रशासन की तरफ से बिल्डर्स को और अधिक फ्लैट्स बनाने की अनुमति मिल गई। इसके तहत सुपरटेक बिल्डर्स को इन टॉवर्स की ऊंचाई 24 मंजिल और 73 मीटर तक बढ़ाने की अनुमति मिल गई। बाद में रिवाइज्ड प्लान के तहत इनकी ऊंचाई को और बढ़ाकर 40/39 मंजिल और 121 मीटर तक कर दिया गया।

दरअसल इन दोनों टॉवर्स के कारण एमराल्ड कोर्ट के बायर्स को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। वहीं वे लोग इसे अपने साथ एक धोखे के रूप में भी ले रहे थे। एमराल्ड कोर्ट के बायर्स को फ्लैट्स बेचते समय बताया गया था कि इस एरिया में ग्रीन पार्क विकसित किया जाएगा। लेकिन बाद में यहाँ ट्विन टॉवर्स बना दिए गए। ऐसे में एमराल्ड कोर्ट के बायर्स को ग्रीन पार्क तो मिल नहीं, उलट इन टॉवर्स की ऊंचाई के कारण हवा और धूप के संचार में भी दिक्कत होने लगी।

वहीं दोनों टॉवर्स के बीच में नियमों के मुताबिक 16 मीटर की दूरी होनी चाहिए जो कि सिर्फ 9 मीटर ही थी। इसे लेकर भी एमराल्ड कोर्ट के निवासियों द्वारा सवाल उठाए जा रहे थे। 16 मीटर की दूरी का नियम इसलिए ज़रूरी है क्योंकि ऊंचे टावर के बराबर में होने से हवा, धूप रुक जाती है। इसके साथ ही आग लगने की दशा में दो टावर्स में कम दूरी होने के कारण आग फैलने का खतरा भी बढ़ जाता है।

किसने उठाई सुपरटेक बिल्डर्स के खिलाफ आवाज?

सुपरटेक के खिलाफ इस लड़ाई को अंजाम देने में चार नाम सबसे प्रमुख हैं। इनमें उदयभान सिंह तेवतिया, एसके शर्मा, एमके जैन और रवि बजाज शामिल हैं। इनमें से एमके जैन की कोरोना के कारण मृत्यु हो चुकी है। सुपरटेक के खिलाफ इस लड़ाई का नेतृत्व उदयभान सिंह तेवतिया ने किया। वे CISF से रिटायर्ड हैं। इन्हीं चारों ने मिलकर सबसे पहले सुपरटेक के खिलाफ आवाज उठाई और अंततः जीतकर ही दम लिया।

बिल्डर के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए सोसाइटी में एक कानूनी समिति का गठन किया गया, जिसमें इन चारों के साथ कुल 40 लोग शामिल थे। इन्होंने चन्दा इकट्ठा कर के बिल्डर के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी।

इस कानूनी समिति ने सबसे पहले यह मुद्दा नोएडा अथॉरिटी में उठाया। समिति ने अथॉरिटी से नक्शा देने की मांग की जिसे बिल्डर के दबाव में पूरा नहीं किया गया। उदयभान सिंह ने बाद में आरोप लगाया कि नोएडा अथॉरिटी ने सुपरटेक के साथ मिलीभगत करके इन टॉवर्स के निर्माण की अवैध मंजूरी दी है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट कब पहुंचा मामला?

नोएडा अथॉरिटी से किसी भी तरह की मदद नहीं मिलने की स्थिति में साल 2012 में एमराल्ड कोर्ट की कानूनी समिति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने इस मामले में नोएडा पुलिस को जांच के आदेश दिए। नोएडा पुलिस ने अपनी जांच में एमराल्ड कोर्ट की कानूनी समिति के आरोपों को सही पाया।

उदयभान सिंह तेवतिया का कहना है कि बिल्डर के दबाव में नोएडा पुलिस की जांच रिपोर्ट को दबा दिया गया। वहीं खानापूर्ति के लिए नोएडा अथॉरिटी ने सुपरटेक को नोटिस तो जारी किया लेकिन अन्य कोई कार्रवाई नहीं की गई। ना ही बिल्डर या अथॉरिटी की तरफ से बायर्स को नक्शा दिया गया।

दूसरी ओर, हाईकोर्ट में मामला पहुँचने के बाद से ही बिल्डर ने इन दोनों टॉवर्स के निर्माण में अप्रत्याशित तेजी दिखानी शुरू कर दी। 2012 में जब ये मामला हाईकोर्ट में पहुंचा, तब तक इन दोनों टॉवर्स की 13 मंजिलों का निर्माण ही पूरा हुआ था। लेकिन हाईकोर्ट में पहुँचने के बाद बिल्डर ने दिन रात काम करवा कर अगले डेढ़ साल में ही 32 मंजिलों का निर्माण पूरा करवा लिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?

जांच रिपोर्ट में आरोप सही पाए जाने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुपरटेक को बाद झटका दिया। हाईकोर्ट ने एमराल्ड कोर्ट की कानूनी समिति की मांग मानते हुए 2014 में इन दोनों टॉवर्स को गिराने के आदेश जारी कर दिए। इस आदेश के बाद ही बिल्डर ने 32 मंजिल पर ही काम रोक दिया था। अन्यथा ये दोनों टॉवर्स 40 मंजिल की ऊंचाई तक बनाए जाने थे।

दूसरी ओर, विशेषज्ञों की माने तो अगर ये टॉवर्स 24 मंजिल क ही बनाए जाते तो शायद टूटने से बच सकते थे, क्योंकि ऐसी स्थिति में दोनों टॉवर्स के बीच की दूरी का नियम टूटने से बच जाता।

सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंचा ये मामला?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ खुद सुपरटेक बिल्डर्स ने ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। हालांकि यहाँ से भी सुपरटेक को कोई राहत नहीं मिली और सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने सुपरटेक को इन टॉवर्स को तोड़े जाने का खर्च वहाँ करने का भी आदेश दिया। वहीं, इनमें फ्लैट्स खरीदने वाले लोगों को उनका पूरा पैसा 14 प्रतिशत ब्याज के साथ लौटाने का भी आदेश दिया।

ट्विन टॉवर्स को गिराने में कितना खर्च आया?

दोनों टॉवर्स को गिराने के लिए दक्षिण अफ्रीका की एक कंपनी JET की सेवाएं ली गई। यह कंपनी डेमोलिशन के मामलों में विशेषज्ञता रखती है। इसके अलावा मुंबई स्थित EDIFICE नाम की कंपनी भी इस डेमोलिशन में शामिल थी।

दोनों टॉवर्स को गिराने में लगभग 17.55 करोड़ रुपये का खर्च आया। इस खर्चे को बिल्डर से ही वसूल गया। जबकि डेमोलिशन के दौरान अन्य बिल्डिंगों को हुए किसी भी तरह के नुकसान का खर्च भी बिल्डर से ही वसूल जाएगा।

ट्विन टॉवर्स की कीमत कितनी थी?

इन दोनों टॉवर्स को बनाने में सुपरटेक ने 200-300 करोड़ रुपये खर्च किये थे। जबकि वर्तमान में इनकी कीमत 700 करोड़ रुपये से ज्यादा थी। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी तरह का विवाद ना होने की स्थिति में इनकी कीमत 1000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा हो सकती थी, क्योंकि इस क्षेत्र में प्रॉपर्टी का रेट 10 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट तक है।

दोनों टॉवर्स को गिराने के बाद इसके मलबे की कीमत ही 15 करोड़ रुपये से ज्यादा आँकी गई है। वहीं सुपरटेक बिल्डर्स ने डेमोलिशन के बाद बयान दिया कि उसे लगभग 500 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। इसमें जमीन की खरीद, कंस्ट्रक्शन और ब्याज का भुगतान शामिल है।

ट्विन टॉवर्स को गिराने में किस तकनीक का सहारा लिया गया?

ट्विन टॉवर्स को गिराने के लिए इम्प्लोशन तकनीक का सहारा लिया गया। इस तकनीक में किसी स्ट्रक्चर को इस तरह से गिराया जाता है कि मलबा एक निश्चित क्षेत्र में अंदर की तरफ ही गिरता है। इससे आसपास की इमारतों को किसी तरह का नुकसान नहीं होता।

इन टॉवर्स को गिराने के लिए कुल 3700 किलोग्राम बारूद का इस्तेमाल किया गया, जिसे दोनों टॉवर्स के ढांचे में ड्रिल करके डाला गया था। धमाके के बाद ये दोनों टॉवर्स लगभग 80 हजार टन मलबे में तब्दील हो गए। इनके मलबे की ऊंचाई ही 5 मंजिला इमारत के बराबर है।

क्या आसपास की बिल्डिंग्स को कोई नुकसान पहुंचा?

अभी तक की जानकारी के मुताबिक आसपास की किसी भी बिल्डिंग को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुँच है। पास की ही एक इमारत के शीशे टूटने की खबर है। वहीं दूसरी तरह की एक सोसाइटी की बॉउन्ड्री वाल का कुछ हिस्सा भी टूटा है। हालांकि किसी भी तरह के चिंताजनक नुकसान के कोई संकेत नहीं मिले हैं।

डेमोलिशन से पहले क्या क्या एहतियात बरती गई थी?

प्रशासन ने दोनों टॉवर्स के डेमोलिशन से पहले एहतियातन कुछ कदम उठाए थे ताकि किसी भी तरह के जान माल का नुकसान ना हो। नोएडा प्रशासन ने आसपास के सभी घरों को खाली करवा लिया था। पास से गुजर रहे नोएडा एक्सप्रेसवे को बंद कर दिया गया। पास की दो सोसाइटी की बिजली और गैस की सप्लाइ काट दी गई थी। इसके अलावा दोनों बिल्डिंग के ऊपर नौ फ्लाइ ज़ोन घोषित किया गया था।

किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए फायरब्रिगेड और NDRF की टीम को स्टैन्ड्बाइ पर रखा गया था। वहीं आसपास के 6 अस्पतालों को भी किसी भी स्थिति को संभालने के लिए तैयार रहने को बोला गया था।

डेमोलिशन के बाद क्या कारवाई की गई?

ट्विन टॉवर्स के डेमोलिशन के बाद आधा किलोमीटर के दायरे में भारी धूल की स्थिति बन गई थी। इससे निपटने के लिए फायर टेंडर्स और एंटी स्माग गन का सहारा लिया गया। अब यहाँ से मलबा हटाने का काम शुरू किया जा चुका है। योजना के मुताबिक पूरा मलबा हटाने में लगभग तीन महीनों का समय लग जाएगा। इस जमीन पर अब एमराल्ड कोर्ट के प्लान के मुताबिक ग्रीन पार्क ही विकसित किया जाएगा।