चीन ने आखिर लिथुआनिया को क्यूँ धमकाया? (Why did China threaten Lithuania?)
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चीन के साथ दुनियाभर के देशों की अदावत जगजाहिर है। अपने पड़ोसी देशों भारत और जापान के साथ तो उसके रिश्ते लगातार तनावपूर्ण चल ही रहे हैं, पश्चिमी देशों जैसे आस्ट्रेलिया से भी उसके कटु संबंध हैं। हाल ही में क्वाड के गठन को लेकर अमेरिका और आस्ट्रेलिया से चीन के संबंध कटु हो गए थे।

इसी क्रम में चीन ने हाल ही में यूरोप के एक छोटे से देश लिथुआनिया को गंभीर नतीजे भुगतने की धमकी दी है। हालांकि लिथुआनिया के साथ चीन का यह तनाव पिछले काफी समय से चला आ रहा है। आइए जानते हैं कि लिथुआनिया ने आखिर ऐसा क्या कर दिया कि चीन उसे धमकी देने पर उतर आया है -

वन चाइना पॉलिसी -

लिथुआनिया के साथ चीन के तनाव को समझने के लिए हमें पहले चीन की ‘वन चाइना पॉलिसी’ को समझना होगा। इस नीति के तहत चीन दुनियाभर के देशों को यह बताता है कि पूरी दुनिया मे केवल एक ही चीन का अस्तित्व है और वह है ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’। वहीं दूसरी ओर ताइवान भी ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना ‘ के रूप में खुद के असली चीन होने का दावा करता है।

दोनों देशों के यह दावे चीनी गृहयुद्ध के बाद से ही चले आ रहे हैं, जब चीन की मुख्यभूमि पर कम्युनिस्ट पार्टी ने कब्जा कर लिया था और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का गठन किया। जबकि दूसरी ओर चीन की राष्ट्रवादी पार्टी के नेता युद्ध मे हार के बाद ताइवान चले गए और रिपब्लिक ऑफ चाइना का गठन किया। तब से दोनों ही असली चीन होने का दावा करते रहे हैं।

हालांकि बाद में चीन ने ‘वन चाइना नीति’ की घोषणा की, जिसके तहत दुनियाभर के देश केवल एक ही चीन के साथ संबंध रख सकते थे। चीन के साथ संबंध रखने वाले देशों को ताइवान के साथ अपने सारे रिश्ते तोड़ने पड़ते और उसे चीन का ही एक भाग मानना होता।

शुरुआत मे इसी नीति को बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिली, लेकिन बाद में चीन की बढ़ती आर्थिक और सैन्य ताकत के कारण दुनिया के अधिकतर देशों ने इस नीति को मान लिया और चीन के साथ संबंध स्थापित कर लिए। चीन ने भी बदले में ऐसे देशों की काफी आर्थिक सहायता की।

वहीं दूसरी ओर ताइवान धीरे धीरे दुनिया में अकेला पड़ता गया और अब केवल गिने चुने देश ही उसे एक देश के रूप में मान्यता देते हैं। हालांकि अमेरिका और अन्य कुछ शक्तिशाली देशों ने बीच का रास्ता अपनाया और ताइवान के साथ रिश्ते बनाए रखे।

अमेरिका के साथ इस तरह के रिश्तों के कारण आज ताइवान, चीन के आक्रमण से बचा हुआ है। हालांकि चीन हमेशा से ताइवान को अपने में मिला लेने के दावे करता रहा है, चाहे उसे इसके लिए बलप्रयोग का ही सहारा क्यूँ ना लेना पड़े।

तो फिर हाल में लिथुआनिया के साथ चीन का विवाद क्यूँ हुआ?

दरअसल लिथुआनिया के साथ चीन के हालिया विवाद के केंद्र में भी चीन की यही नीति है। लिथुआनिया ने ताइवान को अपने यहाँ एक दूतावास खोलने की अनुमति दे दी है जो किसी भी देश के साथ संबंध स्थापित करने की दिशा में पहला कदम होता है। इसके बाद से ही चीन भड़का हुआ है।

चीन का कहना है कि ताइवान, चीन का ही एक हिस्सा है और लिथुआनिया के संबंध पहले से ही चीन के साथ है। ऐसे में ताइवान को दूतावास खोलने की इजाजत देकर लिथुआनिया ने अंतर्राष्ट्रीय नियमों और वन चाइना पॉलिसी का उल्लंघन किया है। चीन हर उस देश को तिरछी नजरों से देखता है जो ताइवान के साथ संबंध रखने की कोशिश करता है।

इस विवाद के बाद चीन ने लिथुआनिया के साथ अपने कूटनीतिक रिश्तों में कटौती कर दी है और अपने राजदूत को वापस बुला लिया है। गौरतलब है कि ताइवान ने हाल ही में अपना दूतावास लिथुआनिया में खोला है। चीन ने इसे अपने आंतरिक मामलों में दखल बताया है। चीन के विदेश मंत्रालय ने इसके बाद कहा कि लिथुआनिया के पास अभी भी भूल सुधार का मौका है। वो चीन को नजरअंदाज करने की भूल ना करे। चीन ने धमकी दी है कि वह अपनी रक्षा और संप्रभुता के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

हालांकि चीन के इस बयान पर ताइवान ने भी पलटवार किया है। ताइवान ने खुद को एक स्वतंत्र देश बताया है और चीन को सलाह दी है कि उसे ताइवान के बाबत कुछ भी कहने का हक नहीं है।